हिंदी कविता
पुष्प की अभिलाषा चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ चाह नहीं, देवों के शिर पर, चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ! मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक। आज नयन के बँगले में आज नयन के बँगले में, संकेत पाहुने आये री सखि! जी से उठे, कसक पर बैठे, और बेसुधी- के बन घूमें, युगल-पलक ले चितवन मीठी, पथ-पद-चिह्न चूम, पथ भूले, दीठ डोरियों पर माधव को। बार-बार मनुहार थकी मैं, पुतली पर बढ़ता-सा यौवन, ज्वार लुटा न निहार सकी मैं ! दोनों कारागृह पुतली के, सावन की झर लाये री सखि! आज नयन के बँगले में, संकेत पाहुने आये री सखि ! उपालम्भ क्यों मुझे तुम खींच लाये? एक गो-पद था, भला था, कब किसी के काम का था? क्षुद्ध तरलाई गरीबिन, अरे कहाँ उलीच लाये? एक पौधा था, पहाड़ी पत्थरों में खेलता था, जि...