हिंदी कविता

                    
                         धरती और आसमान

मैं? मैं हूँ एक प्यारी सी धरती
कभी परिपूर्णता से तृप्त और कभी प्यासी आकाँक्षाओं में तपती.

और तुम? तुम हो एक अंतहीन आसमान
संभावनों से भरपूर और ऊंची तुम्हारी उड़ान
कभी बरसाते हो अंतहीन स्नेह और कभी.....
सिर्फ धूप......ना छांह और ना मेंह.

जब जब बरसता है मुझ पर
तुम्हारा प्रेम और तुम्हारी कामनाओं का मेंह
खिल उठता है मेरा मन और
अंकुरित होती है मेरी देह.

युगों युगों से मुझ पर हो छाए
मुझे अपने गर्वित अंक में समाये
सदियों का अटूट हमारा नाता है ...लेकिन
फिर भी कभी सम्पूर्ण ना हो पाता है.

धरती और आसमान....मिलते हैं तो सिर्फ क्षितिज में
सदियों से यही होता आया है ...और होगा.
जितना करीब आऊं
तुम्हारा सुखद संपर्क उतना ही ओझल हो जाता है.

लेकिन इन सब से मुझे कैसा अनर्थ डर?
अंतहीन युगों के अन्तराल से परे ...जब चाहूँ...

सतरंगी इन्द्रधनुषी रंगों की सीढियां चढ़ती हूँ
रंगीले कोहरे में रोमांचक नृत्य करती हूँ
परमात्मा के रचित मंदिर में तुम पर अर्चित होती हूँ
तुम्हें छू कर, तुम्हें पा कर, तुम पर समर्पित हो कर
फिर खुद ही खुद तक लौट आती हूँ.

अब ना मिलने की ख़ुशी है और ना ही ना मिलने का गम
मैं अब ना मैं हूँ और ना तुम हो तुम.... हैं तो बस अब सिर्फ हैं हम.

सिर्फ कहने भर को हूँ तुमसे मैं दूर.....

तुम्हारे आकर्षण की गुरुता में गुँथी
परस्पर आत्माओं के तृषित बंधन में बँधी
तुम्हारी किरणों के सिंधूरी रंगों से सजी
तुम्हारे मोहक संपर्क में मेरी नस नस रची.

मैं रहूँगी तुम्हारी प्रिया धरती
और रहोगे तुम मेरे प्रिय आसमान
मैं? मैं हूँ आसमान की धरती, और तुम?
तुम हो धरती के आसमान.


 प्यास 

इस कदर छाई है दिल और दिमाग पर तेरी याद की आंधी
इस तूफ़ान में उड़ कर भी तेरे पास क्यों नहीं आ पाती?
इस कदर छाई है तन बदन पर तुझसे मिलने की प्यास
इस प्यास में तड़प कर भी तुझमें खो क्यों नहीं पाती?

बस आ...कि अब तुझ बिन कोई भी मुझे संभाल नहीं सकता
गंगा की वेगवती लहरें शिव की बलिष्ठ जटाएं चाहती हैं
बस आ..कि अब तो आंखें बहुत प्यासी हैं...और....
तेरे दर्शनों के सिवा अब कुछ भी इस प्यास को बुझा नहीं सकता.

तेरी बाँहों के झूले में झूल जाऊं
तेरी आँखों की नमीं में घुल जाऊं
तेरे हाथों की छूअन से पिघल जाऊं
तेरे गर्म सांसो की आँच में जल जाऊं...

तब हाँ...तब....

तब मेरे बदन की सब गिरहें खुल जायेंगी
और मैं तेरी बाँहों में और भी हल्की हो जाऊँगी
एक नशा सा हावी होगा मेरी रग रग में
और मैं एक तितली की तरह
रंगों में सराबोर हो कर आकाश में उड़ जाऊँगी.

चाहे जब मुझे आकाश में उड़ाना, पर मुझे अपनी चाहत में बांधे रखना
ताकी तेरे बंधनों में बंध कर जी सकूँ, उड़ने का सुख पहचान सकूँ
मुझे प्यासी ही रखना, ताकी तेरे लिए हमेशां प्यासी रह सकूँ
मरते दम तक इस प्यास को जी सकूँ, और इसी प्यास में मर सकूँ

अजीब ही बनाया है मालिक ने मुझे
पास लाकर भी दूर ही रखा है तुझसे...
वो ही जानता है इसका राज़.

शायद इस लिए की मिलने की खुशबू तो पल दो पल की , और फिर ख़त्म....
पर जुदाई की तड़प रहती है बरकरार, पल पल और हर दम...
इसी तड़प और इसी प्यार में जी रही हूँ मैं...
हर पल, हर दिन....
तुझसे मिलने की आस में, इंतज़ार में, गुम हूँ मेरे हमदम.

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